कर्ज माफी से परे

तेरह प्रख्यात अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने एक पर्चा जारी किया है जिसमें देश के लिए निष्पक्ष आर्थिक नीति प्रस्तुत की गई है। यह पर्चा अगले छमाही में होने जा रहे आम चुनाव के पहले देश में वृद्घि को बढ़ावा देने वाले सुधारों के इर्दगिर्द आम सहमति बनाने की कोशिश का हिस्सा है। पर्चे में प्राथमिक शिक्षा, बैंकिंग सुधारों और निर्यात संवर्द्धन के अलावा राजनीतिक रूप से संवेदनशील कृषि क्षेत्र को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां की गई हैं। पर्चे में तकनीक की मदद से जमीन अधिग्रहण से जुड़ी बाधाओं और आर्थिक रूप से उन्नत व्यवहार अपनाने की बात कही गई है।

इसमें भूमि बैंक, उचित मूल्य निर्धारण के लिए नीलामी और सरकारी गारंटी वाले भू स्वामित्व के साथ जमीन का पंजीयन आदि शामिल हैं। इसके बावजूद सबसे विवादास्पद सुझाव यह है कि ग्रामीण क्षेत्र की निराशा को कर्ज माफी या उच्च समर्थन मूल्य के जरिये दूर नहीं किया जा सकता। इसके लिए नकदी हस्तांतरण की सिफारिश की गई है। कहा गया कि दुनिया के कई अन्य हिस्सों में अपनाया जा रहा प्रति एकड़ आय सब्सिडी का तरीका भारत में भी अपनाया जा सकता है। यह विश्व व्यापार संगठन के भी अनुरूप है।
यह तरीका दक्षिण भारत के तेलंगाना प्रांत में भी अपनाया जा रहा है और हालिया विधानसभा चुनाव में वहां तेलंगाना राष्ट्र समिति की भारी जीत में इसकी लोकप्रियता को भी एक कारक बताया जा रहा है। देश के अन्य हिस्सों में ऐसे कृषि आय समर्थन का प्रयोग नहीं किया गया है। इसके बजाय ऐसा प्रतीत होता है कि कृषि ऋण माफी तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए वोट जुटाने का आम जरिया बन चुका है। उदाहरण के लिए कांग्रेस ने हालिया विधानसभा चुनाव में हिंदी क्षेत्र के राज्यों में मतदाताओं से वादा किया था कि वह सत्ता में आने के 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ करने की प्रक्रिया शुरू कर देगी। अगर कर्ज माफी को राजनीतिक गारंटी बना दिया जाए तो कृषि ऋण व्यवस्था सुचारु रूप से काम नहीं कर सकती। कृषि संकट वाकई एक दिक्कतदेह बात है लेकिन अगर पैसा खर्च करके ही इसे दूर करना है तो बेहतर यही है कि इसे प्रत्यक्ष हस्तांतरण में व्यय किया जाए। कर्ज माफी के कारण राज्यों पर पड़ रहे वित्तीय बोझ का भी ध्यान रखना होगा। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश वे तीन राज्य हैं जहां कांग्रेस ने चुनाव जीता। इन राज्यों ने बीते वर्षों में अपने यहां राजकोषीय घाटा कम करने का प्रयास किया।
उन्होंने मौजूदा वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे के लिए राज्य सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 3 फीसदी के आसपास का स्तर तय किया था। राजस्थान में यह थोड़ा ज्यादा और छत्तीसगढ़ में थोड़ा कम है। परंतु किसानों के लिए जिस कर्ज माफी की बात कही गई है वह राजकोषीय गणित पर भारी दबाव डालेगी। भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर में एक शोध में कहा कि कर्ज माफी की राशि लगभग 21,900 करोड़ रुपये का बोझ डालेगी जबकि राज्य का कुल पूंजीगत व्यय ही 25,700 करोड़ रुपये है। यह तब होगा जबकि प्रति किसान एक लाख रुपये से कम का कर्ज माफ किया जाए। यह राशि कर्नाटक में घोषित राशि की तुलना में आधी है। वहां भी चुनाव के बाद कृषि ऋण माफी का वादा किया गया था। स्वाभाविक है जितनी बड़ी कर्जमाफी, राजकोष पर उतना बड़ा बोझ। जाहिर है यह वादा अस्थायित्व भरा है। एक सुझाव यह भी है कि निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों से कहे कि वे कर्ज माफी का वादा न करें। यह शायद लागू करने लायक नहीं हो। चाहे जो भी हो, इस बात पर राजनीतिक सहमति बनाना आवश्यक है कि ग्रामीण संकट दूर करने के तरीकों को लेकर प्राथमिकता निर्धारित हो सके

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