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गरीबी और विरोधाभाष

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पिछले वर्ष(2017-2018) के प्रारंभ में ब्रूकिंस संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार भारत में गरीबी की स्थिति काफी बदल गई है। ऑनलाइन डाटाबेस के अनुसार नाइजीरिया के 8.8 करोड़ अत्यधिक गरीबों की तुलना में भारत में 6.3 करोड़ या जनसंख्या का 4.6 प्रतिशत ही अत्यधिक गरीब है। इसके अनुसार हर एक मिनट में 41 भारतीय गरीबी से छुटकारा पा रहे हैं। 2025 तक मात्र 0.5 प्रतिशत भारतीय ही बहुत ज्यादा गरीब रह जाएंगे। भारत को यह उपलब्धि तब मिल रही है, जब विश्व के अधिकांश देशों की समृद्धि बढ़ती जा रही है। अधिकांश देशों ने गरीबी से छुटकारा पाने के मंत्र, आर्थिक विकास को अपना लिया है। अब मुक्त व्यापार, कानून का शासन, संपत्ति का अधिकार एवं उद्यमियों के लिए उपयुक्त वातावरण जैसे आर्थिक विकास के तत्व उत्तरी यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका तक ही सीमित नहीं रहे हैं। एशिया को गरीबी मुक्त होने में मुश्किल से एक दशक का समय लगेगा। आने वाले समय में, उप-सहारा के अफ्रीकी देशों; जैसे- नाइजीरिया एवं कांगो में ही बहुत अधिक गरीबी रह जाएगी। भारत में गरीबी उन्मूलन को लेकर एक अजीब सा विरोधाभास देखने में आता है। स्वतंत्रता के बाद के चार दशकों में ल…

कर्ज माफी से परे

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तेरह प्रख्यात अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने एक पर्चा जारी किया है जिसमें देश के लिए निष्पक्ष आर्थिक नीति प्रस्तुत की गई है। यह पर्चा अगले छमाही में होने जा रहे आम चुनाव के पहले देश में वृद्घि को बढ़ावा देने वाले सुधारों के इर्दगिर्द आम सहमति बनाने की कोशिश का हिस्सा है। पर्चे में प्राथमिक शिक्षा, बैंकिंग सुधारों और निर्यात संवर्द्धन के अलावा राजनीतिक रूप से संवेदनशील कृषि क्षेत्र को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां की गई हैं। पर्चे में तकनीक की मदद से जमीन अधिग्रहण से जुड़ी बाधाओं और आर्थिक रूप से उन्नत व्यवहार अपनाने की बात कही गई है।

इसमें भूमि बैंक, उचित मूल्य निर्धारण के लिए नीलामी और सरकारी गारंटी वाले भू स्वामित्व के साथ जमीन का पंजीयन आदि शामिल हैं। इसके बावजूद सबसे विवादास्पद सुझाव यह है कि ग्रामीण क्षेत्र की निराशा को कर्ज माफी या उच्च समर्थन मूल्य के जरिये दूर नहीं किया जा सकता। इसके लिए नकदी हस्तांतरण की सिफारिश की गई है। कहा गया कि दुनिया के कई अन्य हिस्सों में अपनाया जा रहा प्रति एकड़ आय सब्सिडी का तरीका भारत में भी अपनाया जा सकता है। यह विश्व व्यापार संगठन के भी अनुरूप ह…

आरक्षण पर नई पहल

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संविधान का मूल उद्देश्य लोगों की भलाई है और वह इस देश के लोगों के लिए बना है, न कि लोग उसके लिए बने हैैं। आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को दस प्रतिशत आरक्षण देने का मोदी सरकार का फैसला महज एक बड़ी राजनीतिक पहल ही नहीं, आरक्षण के दायरे से बाहर के गरीबों को एक बड़ा तोहफा भी है। यह फैसला आर्थिक असमानता के साथ ही जातीय वैमनस्य को दूर करने की दिशा में भी एक ठोस कदम है। इसका स्वागत इसलिए होना चाहिए, क्योंकि यह उन सवर्णों के लिए एक बड़ा सहारा है जो आर्थिक रूप से विपन्न होने के बावजूद आरक्षित वर्ग सरीखी सुविधा पाने से वंचित हैैं। इसके चलते वे खुद को असहाय-उपेक्षित तो महसूस कर ही रहे थे, उनमें आरक्षण व्यवस्था को लेकर असंतोष भी उपज रहा था। इस स्थिति को दूर करना सरकार का नैतिक दायित्व था। आर्थिक आधार पर आरक्षण का फैसला सबका साथ सबका विकास की अवधारणा के अनुकूल है। इस फैसले को लेकर ऐसे तर्कों का कोई मूल्य नहीं कि मोदी सरकार ने अपने राजनीतिक हित को ध्यान में रखकर यह फैसला लिया, क्योंकि राजनीतिक दलों के फैसले राजनीतिक हित को ध्यान में रखकर लिए जाते हैैं। सामाजिक न्याय के तहत अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए 27 प्र…

ram mandier issues in ground

रेडियो की महत्व

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आधुनिक प्रगतिशील दौर में नित नए-नए आविष्कार और खोज हो रही हैं। मानवीय अविष्कार प्रकृति के रहस्यो से निरंतर पर्दा हटा रहे हैं। मानव सभ्यता को इस दौर में पहुंचाने का सबसे बड़ा श्रेय जाता है, संचार माध्यमों को। कह सकते हैं कि बिना संचार के यह संभव नहीं था। संचार के माध्यम से ही मानव ने देश-विदेश के विचारों, सभ्यताओं और संस्कृतियों को जाना, उन पर शोध किया और अमल में लाने हेतु प्रयास किए। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि संचार के माध्यम पृथ्वी के सबसे बड़े अविष्कारों में आते हैं।

प्राचीन समय से अब तक की बात करें तो संचार का सबसे तेज और सटीक माध्यम है रेडियो। रेडियो की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से हुई। तब से लेकर आज तक रेडियो की अपनी अलग ही पहचान रही है। जन-जन तक पहुंच बनाने में सफल रेडियो का धीरे-धीरे निरंतर विकास होता गया। 1936 में भारत में सरकारी "इंपीरियल रेडियो ऑफ इंडिया" की शुरुआत हुई जो आजादी के बाद "ऑल इंडिया रेडियो" या आकाशवाणी बन गया। आजादी की लड़ाई में रेडियो का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 24 अगस्त 1942 को नेशनल कांग्रेस स्…

सबरीमाला मंदिर विवाद : यतो धर्म, ततो जय:

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10 से 50 वर्ष तक की महिलाओं का सबरीमाला मंदिर में प्रवेश प्रतिबंधित करना उसी प्रकार से अन्यायपूर्ण है, जिस प्रकार चर्च में किसी स्त्री पादरी का नहीं होना, विधवाओं को सबसे अलग किसी आश्रय स्थल में रखा जाना और महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश न करने देना गलत है। नैतिकता के दृष्टिकोण से देखे जाने पर, कोई भी सही सोच वाला व्यक्ति इसे दावे से गलत कह सकता है।
किसी देश के न्यायालय, समाज के नैतिक पहरेदार नहीं हैं। उनसे तो संविधान के आधार पर मूलभूत प्रश्नों को विवेकपूर्ण तरीके से निर्धरित करने की अपेक्षा की जाती है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के प्रश्न को अगर संवैधानिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह किसी व्यक्ति के पूजा-पाठ संबंधी अधिकार और किसी समुदाय के धार्मिक नियम बनाने के विवाद के बीच फंसा हुआ दिखाई देता है। न्यायविदों ने इस पर अपना निर्णय सुनाते हुए बड़ी चतुराई से प्रश्न के समाधान के संतुलन पर किनारा कर लिया। परन्तु उन्होंने भगवान अयप्पा के भक्तों को एक अलग ‘धार्मिक संज्ञा या संप्रदाय’ न मानकर इस समूह के अस्तित्व को ही एक प्रकार से नकार दिया। ऐसा करके उन्होंने इस समूह के भक्तों क…

प्रजातंत्र में अनिर्वाचित संस्थाओं का महत्व

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हाल के दिनों में सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बीच हुए विवाद ने कुछ सैद्धांतिक प्रश्न खड़े किए हैं? कुछ समीक्षकों का मानना है कि सरकार एक निर्वाचित संस्था है, जबकि आर.बी.आई. के साथ ऐसा नहीं है। प्रजातंत्र में निर्वाचित निकाय का ही वर्चस्व रहना चाहिए। आंशिक रूप से इस तर्क को सत्य माना जा सकता है। परन्तु व्यवहार की दृष्टि से यह अत्यंत घातक हो सकता है। विश्व के सभी सफल प्रजातंत्र, जितना निर्वाचित संस्थाओं पर निर्भर रहे हैं, उतना ही अनिर्वाचित संस्थाओं पर रहे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग तथा सेना भारत के ऐसे अर्निाचित संस्थान हैं, जो सर्वोच्च गरिमा को धारण करते हैं। कुछ लोग नियंत्रक व लेखा परीक्षक (कैग) को भी इसी श्रेणी में रखते हैं। इसके उलट चुने हुए अधिकांश नेताओं को जनता मूर्ख और लुटेरा मानती है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि नेताओं का कोई महत्व नहीं है। लेकिन उनके साथ अस्थायी शक्ति का तथ्य जुड़ा हुआ है। उनका निर्वाचित होना ही केवल उन्हें न्यायालयों, आयोगों और संविधान से श्रेष्ठ नहीं बना सकता है। लालू यादव ने भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद भी कई बार चुनाव जीते, और यह कह दिया गया कि …